John 11

John 11 holds grief, delay, resurrection power, and the gathering death of Jesus together in one chapter where glory is revealed through weeping and command.

فتح تفسير الإصحاح

John 11 does not protect the reader from the offense of divine delay. The chapter begins with love explicitly named and yet Lazarus is still allowed to die. In John 11:4-6, Jesus frames the sickness in terms of God’s glory and then remains where he is, which means the chapter will not let love be measured by immediate rescue. Then the grief becomes personal. In John 11:21-27, Martha speaks from loss and yet is drawn into one of the strongest confessions in the Gospel: Jesus is the resurrection and the life. That confession matters because the chapter is not aiming only at amazement over a miracle. In John 11:33-44, Jesus is deeply moved, he weeps, and then he commands life out of the tomb. Glory is revealed through tears and authority together. But the chapter does not end there. In John 11:45-53, Lazarus’s raising hardens opposition and pushes the leaders toward the death of Jesus. John 11 matters because it asks whether you want a Christ who is only comforting at a distance, or whether you can receive the Lord whose love may delay, whose tears are real, and whose life-giving glory moves straight toward his own death.

How the chapter unfolds

The chapter moves from Lazarus’s sickness and Jesus’ delay into Martha’s confession, Jesus’ tears, Lazarus’s raising, and the council’s resolve to kill Jesus.

Why this chapter matters

It matters because it reveals Jesus not only as comforter in loss but as the resurrection and the life whose glory moves straight toward the cross.

Interpretive tension to watch

Do not read the chapter as a miracle story detached from glory and death. Lazarus is raised in a chapter that also accelerates the path to Jesus’ own death.

أسئلة لهذا الفصل

  • Why does John 11 make room for both Jesus’ delay and his love instead of resolving the tension quickly?
  • How does Martha’s confession prepare the reader to understand the sign of Lazarus rightly?
  • What does the chapter reveal about glory that appears in weeping, command, and the approach of the cross together?

Study with context

Use this as a chapter guide, then press deeper into the text itself. The goal is to slow down observation, notice structure, and ask better questions before jumping to conclusions.

1 उन दिनों में एक आदमी बीमार पड़ गया जिस का नाम लाज़र था। वह अपनी बहनों मरियम और मर्था के साथ बैत — अनियाह में रहता था। 2 यह वही मरियम थी जिस ने बाद में ख़ुदावन्द पर ख़ुश्बू डाल कर उस के पैर अपने बालों से ख़ुश्क किए थे। उसी का भाई लाज़र बीमार था। 3 चुनाँचे बहनों ने ईसा को ख़बर दी, “ख़ुदावन्द, जिसे आप मुहब्बत करते हैं वह बीमार है।” 4 जब ईसा को यह ख़बर मिली तो उस ने कहा, “इस बीमारी का अन्जाम मौत नहीं है, बल्कि यह ख़ुदा के जलाल के वास्ते हुआ है, ताकि इस से ख़ुदा के फ़र्ज़न्द को जलाल मिले।” 5 ईसा मर्था, मरियम और लाज़र से मुहब्बत रखता था। 6 तो भी वह लाज़र के बारे में ख़बर मिलने के बाद दो दिन और वहीं ठहरा। 7 फिर उस ने अपने शागिर्दों से बात की, “आओ, हम दुबारा यहूदिया चले जाएँ।” 8 शागिर्दों ने एतराज़ किया, “उस्ताद, अभी अभी वहाँ के यहूदी आप पर पथराव करने की कोशिश कर रहे थे, फिर भी आप वापस जाना चाहते हैं?” 9 ईसा ने जवाब दिया, “क्या दिन में रोशनी के बारह घंटे नहीं होते? जो शख़्स दिन के वक़्त चलता फिरता है वह किसी भी चीज़ से नहीं टकराएगा, क्यूँकि वह इस दुनियाँ की रोशनी के ज़रिए देख सकता है। 10 लेकिन जो रात के वक़्त चलता है वह चीज़ों से टकरा जाता है, क्यूँकि उस के पास रोशनी नहीं है।” 11 फिर उस ने कहा, “हमारा दोस्त लाज़र सो गया है। लेकिन मैं जा कर उसे जगा दूँगा।” 12 शागिर्दों ने कहा, “ख़ुदावन्द, अगर वह सो रहा है तो वह बच जाएगा।” 13 उन का ख़याल था कि ईसा लाज़र की दुनियावी नींद का ज़िक्र कर रहा है जबकि हक़ीक़त में वह उस की मौत की तरफ़ इशारा कर रहा था। 14 इस लिए उस ने उन्हें साफ़ बता दिया, “लाज़र की मौत हो गई है 15 और तुम्हारी ख़ातिर मैं ख़ुश हूँ कि मैं उस के मरते वक़्त वहाँ नहीं था, क्यूँकि अब तुम ईमान लाओगे। आओ, हम उस के पास जाएँ।” 16 तोमा ने जिस का लक़ब जुड़वाँ था अपने साथी शागिर्दों से कहा, “चलो, हम भी वहाँ जा कर उस के साथ मर जाएँ।” 17 वहाँ पहुँच कर ईसा को मालूम हुआ कि लाज़र को क़ब्र में रखे चार दिन हो गए हैं। 18 बैत — अनियाह का येरूशलेम से फ़ासिला तीन क़िलोमीटर से कम था, 19 और बहुत से यहूदी मर्था और मरियम को उन के भाई के बारे में तसल्ली देने के लिए आए हुए थे। 20 यह सुन कर कि ईसा आ रहा है मर्था उसे मिलने गई। लेकिन मरियम घर में बैठी रही। 21 मर्था ने कहा, “ख़ुदावन्द, अगर आप यहाँ होते तो मेरा भाई न मरता। 22 लेकिन मैं जानती हूँ कि अब भी ख़ुदा आप को जो भी माँगोगे देगा।” 23 ईसा ने उसे बताया, “तेरा भाई जी उठेगा।” 24 मर्था ने जवाब दिया, जी, “मुझे मालूम है कि वह क़यामत के दिन जी उठेगा, जब सब जी उठेंगे।” 25 ईसा ने उसे बताया, “क़यामत और ज़िन्दगी तो मैं हूँ। जो मुझ पर ईमान रखे वह ज़िन्दा रहेगा, चाहे वह मर भी जाए। 26 और जो ज़िन्दा है और मुझ पर ईमान रखता है वह कभी नहीं मरेगा। मर्था, क्या तुझे इस बात का यक़ीन है?” 27 मर्था ने जवाब दिया, “जी ख़ुदावन्द, मैं ईमान रखती हूँ कि आप ख़ुदा के फ़र्ज़न्द मसीह हैं, जिसे दुनियाँ में आना था।” 28 यह कह कर मर्था वापस चली गई और चुपके से मरियम को बुलाया, “उस्ताद आ गए हैं, वह तुझे बुला रहे हैं।” 29 यह सुनते ही मरियम उठ कर ईसा के पास गई। 30 वह अभी गाँव के बाहर उसी जगह ठहरा था जहाँ उस की मुलाक़ात मर्था से हुई थी। 31 जो यहूदी घर में मरियम के साथ बैठे उसे तसल्ली दे रहे थे, जब उन्हों ने देखा कि वह जल्दी से उठ कर निकल गई है तो वह उस के पीछे हो लिए। क्यूँकि वह समझ रहे थे कि वह मातम करने के लिए अपने भाई की क़ब्र पर जा रही है। 32 मरियम ईसा के पास पहुँच गई। उसे देखते ही वह उस के पैरों में गिर गई और कहने लगी, “ख़ुदावन्द, अगर आप यहाँ होते तो मेरा भाई न मरता।” 33 जब ईसा ने मरियम और उस के लोगों को रोते देखा तो उसे दुःख हुआ। और उसने ताअ'ज्जुब होकर 34 उस ने पूछा, “तुम ने उसे कहाँ रखा है?” उन्हों ने जवाब दिया, “आएँ ख़ुदावन्द, और देख लें।” 35 ईसा “रो पड़ा। 36 यहूदियों ने कहा, देखो, वह उसे कितना प्यारा था।” 37 लेकिन उन में से कुछ ने कहा, इस आदमी ने अंधे को सही किया। “क्या यह लाज़र को मरने से नहीं बचा सकता था?” 38 फिर ईसा दुबारा बहुत ही मायूस हो कर क़ब्र पर आया। क़ब्र एक ग़ार थी जिस के मुँह पर पत्थर रखा गया था। 39 ईसा ने कहा, “पत्थर को हटा दो।” लेकिन मर्हूम की बहन मर्था ने एतराज़ किया, “ख़ुदावन्द, बदबू आएगी, क्यूँकि उसे यहाँ पड़े चार दिन हो गए हैं।” 40 ईसा ने उस से कहा, “क्या मैंने तुझे नहीं बताया कि अगर तू ईमान रखे तो ख़ुदा का जलाल देखेगी?” 41 चुनाँचे उन्हों ने पत्थर को हटा दिया। फिर ईसा ने अपनी नज़र उठा कर कहा, “ऐ बाप, मैं तेरा शुक्र करता हूँ कि तू ने मेरी सुन ली है। 42 मैं तो जानता हूँ कि तू हमेशा मेरी सुनता है। लेकिन मैं ने यह बात पास खड़े लोगों की ख़ातिर की, ताकि वह ईमान लाएँ कि तू ने मुझे भेजा है।” 43 फिर ईसा ज़ोर से पुकार उठा, “लाज़र, निकल आ!” 44 और मुर्दा निकल आया। अभी तक उस के हाथ और पाँओ पट्टियों से बँधे हुए थे जबकि उस का चेहरा कपड़े में लिपटा हुआ था। ईसा ने उन से कहा, “इस के कफ़न को खोल कर इसे जाने दो।” 45 उन यहूदियों में से जो मरियम के पास आए थे बहुत से ईसा पर ईमान लाए जब उन्हों ने वह देखा जो उस ने किया। 46 लेकिन कुछ फ़रीसियों के पास गए और उन्हें बताया कि ईसा ने क्या किया है। 47 तब राहनुमा इमामों और फ़रीसियों ने यहूदियों ने सदरे अदालत का जलसा बुलाया। उन्हों ने एक दूसरे से पूछा, “हम क्या कर रहे हैं? यह आदमी बहुत से ख़ुदाई करिश्मे दिखा रहा है। 48 अगर हम उसे यूँही छोड़ें तो आख़िरकार सब उस पर ईमान ले आएँगे। फिर रोमी हाकिम आ कर हमारे बैत — उल — मुक़द्दस और हमारे मुल्क को तबाह कर देंगे।” 49 उन में से एक काइफ़ा था जो उस साल इमाम — ए — आज़म था। उस ने कहा, “आप कुछ नहीं समझते 50 और इस का ख़याल भी नहीं करते कि इस से पहले कि पूरी क़ौम हलाक हो जाए बेहतर यह है कि एक आदमी उम्मत के लिए मर जाए।” 51 उस ने यह बात अपनी तरफ़ से नहीं की थी। उस साल के इमाम — ए — आज़म की हैसियत से ही उस ने यह पेशीनगोई की कि ईसा यहूदी क़ौम के लिए मरेगा। 52 और न सिर्फ़ इस के लिए बल्कि ख़ुदा के बिखरे हुए फ़र्ज़न्दों को जमा करके एक करने के लिए भी। 53 उस दिन से उन्हों ने ईसा को क़त्ल करने का इरादा कर लिया। 54 इस लिए उस ने अब से एलानिया यहूदियों के दरमियान वक़्त न गुज़ारा, बल्कि उस जगह को छोड़ कर रेगिस्तान के क़रीब एक इलाक़े में गया। वहाँ वह अपने शागिर्दों समेत एक गाँव बनाम इफ़्राईम में रहने लगा। 55 फिर यहूदियों की ईद — ए — फ़सह क़रीब आ गई। देहात से बहुत से लोग अपने आप को पाक करवाने के लिए ईद से पहले पहले येरूशलेम पहुँचे। 56 वहाँ वह ईसा का पता करते और हैकल में खड़े आपस में बात करते रहे, “क्या ख़याल है? क्या वह ईद पर नहीं आएगा?” 57 लेकिन राहनुमा इमामों और फ़रीसियों ने हुक्म दिया था, अगर किसी को मालूम हो जाए कि ईसा कहाँ है तो वह ख़बर दे ताकि हम उसे गिरफ़्तार कर लें।

حوّل القراءة إلى دراسة حقيقية

سجّل لحفظ الآيات وتدوين الملاحظات والدراسة بأدوات الذكاء الاصطناعي.

ملاحظات الكتاب المقدس الدراسي لهذا الإصحاح ملاحظات عدد بعدد وتفسير مباشر مرتبط بهذا الإصحاح.
الكتاب المقدس الدراسي

ملاحظات عدد بعدد

الأعداد 11:4-27 Deep

Love is not disproved by delay when glory is doing a deeper work

فتح

John 11 forces the reader to hold love and delay together. Jesus does not hurry to prevent sorrow, yet his delay serves a greater revelation of who he is.

مقاطع رئيسية
الأعداد 11:33-53 Standard

Resurrection glory appears in tears, command, and the shadow of the cross together

فتح

Jesus weeps, raises Lazarus, and provokes the death plot against himself in the same chapter. The sign reveals life-giving glory that moves directly toward sacrificial death.

مقاطع رئيسية
خلفية ورؤى لغوية تفاصيل اللغة الأصلية والخلفية الثقافية ولماذا تغير قراءة هذا الإصحاح.
عمق

رؤى اللغة الأصلية

John 11:25 · Greek انتقل إلى النص

egō eimi hē anastasis kai hē zōē (ego eimi he anastasis kai he zoe)

حرفية: I am the resurrection and the life

Jesus does not merely promise resurrection as an event. He identifies it with himself, making hope personal before it is chronological.

It centers the chapter on Christ himself rather than on Lazarus as the final point of wonder.

مقاطع رئيسية
الخلفية

السياق الثقافي

John 11 · Funeral grief and glory-through-death world انتقل إلى النص

John 11 unfolds in a mourning household where ritual grief, delayed arrival, and public expectation heighten the scandal of Jesus’ actions and words.

Modern readers may focus on the miracle and miss how deeply the chapter is structured by grief, delay, and the looming death of Jesus himself.

It keeps John 11 from becoming a detached miracle story and restores its cross-shadowed glory.

مقاطع رئيسية
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