Acts 27

带着目的阅读这一章

向 AI 询问这一章

Acts 27 places apostolic confidence in the middle of storm, failed seamanship, collapsing certainty, and God’s unbroken word over every life on the ship.

打开章节注释

Acts 27 is not about admiring courage in rough weather. It is about the supremacy of God’s word when every human measure of control is breaking apart. At the beginning, Paul warns that the voyage will end in disaster, yet his judgment is set aside in Acts 27:9-11. That matters because the storm that follows is not just meteorological pressure. It exposes the false confidence people place in experience, calculation, and visible conditions. By Acts 27:20 all hope of being saved seems taken away. Then the chapter turns in Acts 27:21-26 when Paul speaks not as a man managing chaos but as a servant who has heard from God. The ship may be lost, but not a life will perish, because God has spoken. Even then, obedience remains necessary. In Acts 27:30-32 the sailors cannot be allowed to escape on their own terms. Acts 27 matters because it asks whether you trust God only when his promise agrees with the weather, or whether you can stand on his word when the whole vessel of your visible security is coming apart.

How the chapter unfolds

The chapter moves from ignored warning to violent storm, angelic assurance, and shipwreck in which God preserves all exactly as promised.

Why this chapter matters

It matters because it shows faith not as denial of danger but as steadiness under danger because God’s word governs what chaos cannot overturn.

Interpretive tension to watch

Do not read Acts 27 as adventure narrative alone. The storm exposes how quickly human judgment, expertise, and control fail when God drives his purposes through crisis.

这一章的思考问题

  • Why does Acts 27 emphasize ignored warning before it emphasizes rescue?
  • How does Paul’s calm in the storm differ from denial, bravado, or mere optimism?
  • What does the chapter reveal about obedience to God’s word when every visible condition argues for panic?

Study with context

Use this as a chapter guide, then press deeper into the text itself. The goal is to slow down observation, notice structure, and ask better questions before jumping to conclusions.

1 जब जहाज़ पर इतालिया को हमारा जाना ठहराया गया तो उन्होंने पौलुस और कुछ और क़ैदियों को शहन्शाही पलटन के एक सुबेदार अगस्तुस ने यूलियुस नाम के हवाले किया। 2 और हम अद्रमुतय्युस के एक जहाज़ पर जो आसिया के किनारे के बन्दरगाहों में जाने को था। सवार होकर रवाना हुए और थिस्सलुनीकियों का अरिस्तरख़ुस मकिदुनी हमारे साथ था। 3 दूसरे दिन सैदा में जहाज़ ठहराया, और यूलियुस ने पौलुस पर मेहरबानी करके दोस्तों के पास जाने की इजाज़त दी। ताकि उस की ख़ातिरदारी हो। 4 वहाँ से हम रवाना हुए और कुप्रुस की आड़ में होकर चले इसलिए कि हवा मुख़ालिफ़ थी। 5 फिर किलकिया और पम्फ़ीलिया सूबे के समुन्दर से गुज़र कर लूकिया के शहर मूरा में उतरे। 6 वहाँ सुबेदार को इस्कन्दरिया का एक जहाज़ इतालिया जाता हुआ, मिला पस, हमको उस में बैठा दिया। 7 और हम बहुत दिनों तक आहिस्ता आहिस्ता चलकर मुश्किल से कनिदुस शहर के सामने पहुँचे तो इसलिए कि हवा हम को आगे बढ़ने न देती थी सलमूने के सामने से हो कर करेते टापू की आड़ में चले। 8 और बमुश्किल उसके किनारे किनारे चलकर हसीन — बन्दर नाम एक मक़ाम में पहुँचे जिस से लसया शहर नज़दीक था। 9 जब बहुत अरसा गुज़र गया और जहाज़ का सफ़र इसलिए ख़तरनाक हो गया कि रोज़ा का दिन गुज़र चुका था। तो पौलुस ने उन्हें ये कह कर नसीहत की। 10 कि ऐ साहिबो। मुझे मालूम होता है, कि इस सफ़र में तकलीफ़ और बहुत नुक़्सान होगा, न सिर्फ़ माल और जहाज़ का बल्कि हमारी जानों का भी। 11 मगर सुबेदार ने नाख़ुदा और जहाज़ के मालिक की बातों पर पौलुस की बातों से ज़्यादा लिहाज़ किया। 12 और चूँकि वो बन्दरगाह जाड़ों में रहने कि लिए अच्छा न था, इसलिए अक्सर लोगों की सलाह ठहरी कि वहाँ से रवाना हों, और अगर हो सके तो फ़ेनिक्स शहर में पहुँच कर जाड़ा काटें; वो करेते का एक बन्दरगाह है जिसका रुख शिमाल मशरिक़ और जुनूब मशरिक़ को है। 13 जब कुछ कुछ दक्खिना हवा चलने लगी तो उन्हों ने ये समझ कर कि हमारा मतलब हासिल हो गया लंगर उठाया और करेते के किनारे के क़रीब क़रीब चले। 14 लेकिन थोड़ी देर बाद एक बड़ी तुफ़ानी हवा जो यूरकुलोन कहलाती है करेते पर से जहाज़ पर आई। 15 और जब जहाज़ हवा के क़ाबू में आ गया, और उस का सामना न कर सका, तो हम ने लाचार होकर उसको बहने दिया। 16 और कौदा नाम एक छोटे टापू की आड़ में बहते बहते हम बड़ी मुश्किल से डोंगी को क़ाबू में लाए। 17 और जब मल्लाह उस को उपर चढ़ा चुके तो जहाज़ की मज़बूती की तदबीरें करके उसको नीचे से बाँधा, और सूरतिस के चोर बालू में धंस जाने के डर से जहाज़ का साज़ो सामान उतार लिया। और उसी तरह बहते चले गए। 18 मगर जब हम ने आँधी से बहुत हिचकोले खाए तो दूसरे दिन वो जहाज़ का माल फेंकने लगे। 19 और तीसरे दिन उन्हों ने अपने ही हाथों से जहाज़ के कुछ आलात — ओ — 'असबाब भी फेंक दिए। 20 जब बहुत दिनों तक न सूरज नज़र आया न तारे और शिद्दत की आँधी चल रही थी, तो आख़िर हम को बचने की उम्मीद बिल्कुल न रही। 21 और जब बहुत फ़ाक़ा कर चुके तो पौलुस ने उन के बीच में खड़े हो कर कहा, ऐ साहिबो; लाज़िम था, कि तुम मेरी बात मान कर करेते से रवाना न होते और ये तकलीफ़ और नुक़्सान न उठाते। 22 मगर अब मैं तुम को नसीहत करता हूँ कि इत्मीनान रख्खो; क्यूँकि तुम में से किसी का नुक़्सान न होगा मगर जहाज़ का। 23 क्यूँकि ख़ुदा जिसका मैं हूँ, और जिसकी इबादत भी करता हूँ, उसके फ़रिश्ते ने इसी रात को मेरे पास आकर। 24 कहा, पौलुस, न डर। ज़रूरी है कि तू क़ैसर के सामने हाज़िर हो, और देख जितने लोग तेरे साथ जहाज़ में सवार हैं, उन सब की ख़ुदा ने तेरी ख़ातिर जान बख़्शी की। 25 इसलिए “ऐ साहिबो; इत्मीनान रख्खो; क्यूँकि मैं ख़ुदा का यक़ीन करता हूँ, कि जैसा मुझ से कहा गया है, वैसा ही होगा। 26 लेकिन ये ज़रूर है कि हम किसी टापू में जा पड़ें” 27 जब चौधवीं रात हुई और हम बहर — ए — अद्रिया में टकराते फिरते थे, तो आधी रात के क़रीब मल्लाहों ने अंदाज़े से मा'लूम किया कि किसी मुल्क के नज़दीक पहुँच गए। 28 और पानी की थाह लेकर बीस पुर्सा पाया और थोड़ा आगे बढ़ कर और फिर थाह लेकर पन्द्रह पुर्सा पाया। 29 और इस डर से कि पथरीली चट्टानों पर जा पड़ें, जहाज़ के पीछे से चार लंगर डाले और सुबह होने के लिए दुआ करते रहे। 30 और जब मल्लाहों ने चाहा कि जहाज़ पर से भाग जाएँ, और इस बहाने से कि गलही से लंगर डालें, डोंगी को समुन्दर में उतारें। 31 तो पौलुस ने सुबेदार और सिपाहियों से कहा “अगर ये जहाज़ पर न रहेंगे तो तुम नहीं बच सकते।” 32 इस पर सिपाहियों ने डोंगी की रस्सियाँ काट कर उसे छोड़ दिया। 33 और जब दिन निकलने को हुआ तो पौलुस ने सब की मिन्नत की कि खाना खालो और कहा कि तुम को इन्तज़ार करते करते और फ़ाक़ा करते करते आज चौदह दिन हो गए; और तुम ने कुछ नहीं खाया। 34 इसलिए तुम्हारी मिन्नत करता हूँ कि खाना खालो, इसी में तुम्हारी बहतरी मौक़ूफ़ है, और तुम में से किसी के सिर का बाल बाका न होगा। 35 ये कह कर उस ने रोटी ली और उन सब के सामने ख़ुदा का शुक्र किया, और तोड़ कर खाने लगा। 36 फिर उन सब की ख़ातिर जमा हुई, और आप भी खाना खाने लगे। 37 और हम सब मिलकर जहाज़ में दो सौ छिहत्तर आदमी थे। 38 जब वो खा कर सेर हुए तो गेहूँ को समुन्दर में फेंक कर जहाज़ को हल्का करने लगे। 39 जब दिन निकल आया तो उन्होंने उस मुल्क को न पहचाना, मगर एक खाड़ी देखी, जिसका किनारा साफ़ था, और सलाह की कि अगर हो सके तो जहाज़ को उस पर चढ़ा लें। 40 पस, लंगर खोल कर समुन्दर में छोड़ दिए, और पत्वारों की भी रस्सियाँ खोल दी; और अगला पाल हवा के रुख पर चढ़ा कर उस किनारे की तरफ़ चले। 41 लेकिन एक ऐसी जगह जा पड़े जिसके दोनों तरफ़ समुन्दर का ज़ोर था; और जहाज़ ज़मीन पर टिक गया, पस गलही तो धक्का खाकर फ़ँस गई; मगर दुम्बाला लहरों के ज़ोर से टूटने लगा। 42 और सिपाहियों की ये सलाह थी, कि क़ैदियों को मार डालें, कि ऐसा न हो कोई तैर कर भाग जाए। 43 लेकिन सुबेदार ने पौलुस को बचाने की ग़रज़ से उन्हें इस इरादे से बाज़ रख्खा; और हुक्म दिया कि जो तैर सकते हैं, पहले कूद कर किनारे पर चले जाएँ। 44 बाक़ी लोग कुछ तख़्तों पर और कुछ जहाज़ की और चीज़ों के सहारे से चले जाएँ; इसी तरह सब के सब ख़ुश्की पर सलामत पहुँच गए।

把阅读变成真正的学习

注册后可收藏经文、记笔记,并使用AI学习工具。

这一章的研读本注释 锚定在这一章的逐节注释和直接注释。
研读本圣经

逐节注释

经文 27:9-26 Standard

Faith does not deny the storm; it stands on God’s word within it

打开

Paul does not minimize danger. He names it, then anchors the whole company in what God has said. That is why his calm is not optimism but obedience under revelation.

关键经文
经文 27:30-44 Deep

God’s promise does not cancel the need for obedient action

打开

The sailors cannot flee and still claim the promise. Acts 27 keeps assurance and obedience together, showing that trust in God’s word produces submitted action rather than passive presumption.

💥 Truth

Assurance becomes counterfeit the moment it is used to excuse disobedience.

关键经文
背景和语言见解 原文细节、文化背景,以及它们如何改变对这一章的理解。
深度

原文见解

Acts 27:25 · Greek 跳转到经文

pisteuō (pisteuo)

直译: to trust / believe

Paul’s confidence is not vague positivity. It is explicit trust that what God has spoken will prove true in the middle of visible collapse.

It keeps Acts 27 anchored in faith under revelation rather than personality under stress.

关键经文
背景

文化语境

Acts 27 · Ancient seamanship and imperial-travel world 跳转到经文

Acts 27 unfolds in the perilous world of ancient Mediterranean travel, where seasonal sailing limits, storm fear, cargo loss, and military custody were immediate realities.

Modern readers may treat the storm as cinematic drama and miss how thoroughly the chapter dismantles human confidence in expertise and control.

It makes Acts 27 sound like revelation governing panic in a world where the sea regularly exposed human limits.

关键经文
选择读完这一章后的下一步 继续阅读、选择计划,或继续使用 AI 研习。
跟随这一章开启的主题 针对这一章可能开启的更大问题的相关主题中心。